
कवच भारतीय रेलवे द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित एक स्वचालित ट्रेन प्रणाली है। इसे ट्रेनों को आपस में टकराने से रोकने और दुर्घटनाओं को शून्य पर लाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह प्रणाली पटरियों पर लगे आरएफआईडी (RFID) टैग, रेलवे स्टेशनों पर लगे कंप्यूटर सिस्टम और ट्रेनों के अंदर लगे उपकरणों के बीच रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए लगातार संपर्क बनाए रखती है।
यदि लोको पायलट किसी कारणवश लाल सिग्नल को पार कर जाता है या गति सीमा से तेज गाड़ी चलाता है, तो कवच सिस्टम ट्रेन के ब्रेक अपने आप लगा देता है। अगर एक ही पटरी पर आमने-सामने या आगे-पीछे दो ट्रेनें आ जाती हैं, तो कवच दोनों ट्रेनों को एक निश्चित दूरी पर अपने आप रोक देता है। कोहरे या भारी बारिश के कारण जब दृश्यता बहुत कम होती है, तब यह पायलट के केबिन के अंदर ही सिग्नल की लाइव जानकारी दिखाता है। जब ट्रेन किसी रेलवे फाटक के पास पहुंचती है, तो यह सिस्टम अपने आप हॉर्न बजा देता है।
यह तकनीक दुनिया के सबसे कड़े सुरक्षा मानकों में से एक, सेफ्टी इंटीग्रिटी लेवल-4 (SIL-4) पर प्रमाणित है, जिसका मतलब है कि इसमें गलती की गुंजाइश 10,000 वर्षों में सिर्फ एक बार हो सकती है।
भारत में अब तक 3,100 से अधिक रूट किलोमीटर पर कवच सिस्टम पूरी तरह से काम कर रहा है। लगभग 2,800 से अधिक रेल इंजनों में कवच के सुरक्षा उपकरण फिट किए जा चुके हैं। वंदे भारत जैसी सभी आधुनिक और प्रीमियम ट्रेनों में इस तकनीक को पहले से ही शामिल किया जा रहा है। इसके सबसे आधुनिक वर्जन कवच 4.0 को अकेले 1,300 किलोमीटर से अधिक के व्यस्त रूटों पर सक्रिय किया जा चुका है। रेलवे ने जुलाई 2026 से आगे के लिए हर साल 5,000 किलोमीटर ट्रैक पर कवच लगाने का लक्ष्य रखा है।
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